Monday, 27 November 2017

छब्बीस ग्यारह

वक़्त ने उन ज़ख्मो को फिर से याद दिला दिया
सन्नाटों मैं भी वह गूँज आज फिर सुनाई दी

अँधेरे ने उस डर को आज फिर महसूस करवा दिया
समंदर की लहरों ने उस कश्ती के वजूद का एहसास आज फिर दिला दिया

बिखरे टुकड़ो को समेट कर जीने लगे थे
खौफ भरी साँसों मैं ज़िन्दगी का गूंठ पिने लगे थे

पर चाहकर भी वह रात ज़ेहेन से निकलती नहीं
उन ज़ख्मो की ढूंढ़ने पर भी, दवा अब तक मिली नहीं

भूले नहीं है हम और ना ही कभी भूलेंगे
जो खून हमारा बहा, उस दिप की ज्योत सदा जलती रखेंगे


-SR.





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