Sunday, 12 November 2017

बॉम्बे से मुंबई तक

आईये सुन्ते है इस शहर के कुछ किस्से
कल था बॉम्बे, कभी है बम्बई और मुंबई है अब से
जो भी कहो पर, है प्यारा तो सबको मनसे

कहते है पहले ये सात तुकड़ो मैं पड़ा था
समंदर की लहरों को रोक कर एक बॉम्बे बनाया था

राजधानी तो वैसे ये महाराष्ट्र की है
पर गुजरात के दिल मैं प्यार आज भी ज़िंदा है

इसके आखरी स्टेशन के किस्से भी कमाल के है
जो दिखता है वह टिकता नहीं
और यदि उससे ढूंढोगे तो मिलता नहीं

पाठशाला मैं जिससे कहा था वि.टी
महाविद्यालय मैं आते ही हुआ सी.एस.टी
पर जब वक़्त आया नौकरी के दिनों का
तब नाम पड़ गया था सी.एस.ऍम.टी

अगर चर्चगेट पे उतरो तो चर्च नहीं मिलता
गुजरती हुई गरीब रथ मैं कोई गरीब नहीं दिखता

नाम तो कपड़ो की तरह रोज यहाँ बदलते है
जो अयोध्या ना कर सकी वो भी देश को इसने कर दिखाया

चार फुट से ज्यादा हम पेड़ो को बढ़ने नहीं देते
और जो कुदरत की देन है उससे छांटकर
वहां रेल का गेराज बना देते है

जब तक खून गिरता नहीं होश मैं हम आते नहीं
और कुछ मोमबत्तियां जलाकर फिर नींद मैं लौट जाते है

कभी भाषा पे लड़ते है तो कभी जात के नाम पर काटते है
पर छब्बीस जुलाई की तरह कुछ हो जाये
तो सभी मैं इंसान नजर आते है

देश को तो आर्थिक रूप से हम चलाते है
उसके बुरे वक़्त मैं हम काम भी आते है

पर यदि वक़्त हमारा ख़राब हो
तो हर बार गुड स्पिरिट कह कर
सभी हमें अपने हाल पे छोड़ देते है

यहाँ आये हुए सभी लोग अपने गांव या शहरों से इसकी तुलना करते है
कुछ अच्छा कहना तो दूर की बात ताने जरूर मारते है

पर जब रोजी रोटी का सवाल आये
तो दौड़कर वहीँ लोग यहीं वापस आते है

इसके बारे मैं कोई कुछ कहे ये हम सुन्न नहीं सकते
चाहे कहीं भी हम रहे, इसकी याद आये बगैर रह नहीं सकते

लाख हो बुराईयां इसमें पर भारत की ये शान है
कोई और इसे कुछ भी कहे, लेकिन मेरे लिए तो ये मुंबई मेरी जान है



-SR.

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