Monday, 27 January 2020

पहाड़ों में

सन्नाटे में भी एक गूंज थी
हर सांस में एक ज़िन्दगी थी 
शहरों में तो सबकुछ पैसों में तोलते है

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है

हर एक कदम में खुशी थी
पेड़ की हर एक टेहनी पर
झूल रही सबकी ज़िन्दगी थी 

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है।

धरती की गोद में लेटने का सुकून था
तारो की चद्दर ओढ़कर चांदनी का मजा ही निराला था
उस कड़ाडी ठंड में एक प्याला चाय भी सुकून दे जाता है

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है।

चेहरे अजनबी थे फिर भी अपने से लगते थे
सीमेंट के जंगल की तरह नकाबों में नहीं थे
कई अनकहे से रिश्ता बन जाते है

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है।

रास्ते भले सबके अलग थे, पर जिस मोड़ पर मिले 
वहां से मंज़िल तो सबकी एक ही थी 
कहीं तरह के लोगों से मिलने का अवसर मिल जाता है

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है।

मंज़िल पर पहुंचते ही, कुछ पाने की खुशी थी 
तो कहीं बिछड़ने का ग़म भी था
पर फिर मिलेंगे, इस उम्मीद से संजीवनी मिल जाती है

कुछ दिन तो गुजारो पहाड़ों में
अपने होने का एहसास होता है।


-SR.

PS: May The Force Be With You !!

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