पंखों के बगैर उड़ने लगा था
सारा आसमान, अपनी मुठ्ठी में
समेटने लगा था
कुछ पलों के लिए ही सही
बंध आखों से देखे सपनों को
सच मानने लगा था
अपने हैसियत से भी बड़ी
छलांग मारने चला था
नादान दिल ने, बनाए उस महल को
आंखों के सामने बिखरता हुआ देखा
जब समय के कांटों ने,
वर्तमान का एहसास दिला दिया
कुछ पलों के लिए ही सही
सपना पूरा होते, दिख ने लगा
जीत की मुस्कुराहट में भीगने लगा था
अब, बिखरे हुए उन टुकड़ों से
वह आशियाना फिर से जोड़ना है
इस तूफान में भी
अभी और लड़ना ना है
-SR.
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