Sunday, 11 September 2016

ये अँधेरा कुछ केहता है

ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है
शायद ये अँधेरा कुछ मुझसे केहता है

रास्ता कहीं भटक न जाऊं
इसलिए काले आइने मैं दो पल मेरे लिए रखता है

युही हम रात को कोसते है
सूरज की मोह मैं चांदनी का मजा खो देते है

कदम तो अभी बाहर निकले है
कारवाँ तो सेकड़ो और भी है

तू मुसाफिर है, तुझे सिर्फ चलना है
समय की इस परीक्षा मैं तुझे भी खड़ा उतरना है

तेरे हौसलो मैं अगर जान है
तो रास्ता तुझे ज़रूर मिलेगा

निशाने पर अगर तेरे आसमान है
तो सितारों मैं तो जरूर गिरेगा

भले ही हो आज अँधेरा बहुत, पर सूरज जरूर निकलेगा
ये मौसम भी बदलेगा और वक़्त फिर झूम उठेगा



-SR.

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