Saturday, 22 September 2018

जब अंधेरा छाया

जब अंधेरा छाया
सन्नाटों कि गूंज से
धड़कने थम सी ‌गयी

परछाईं ने भी अब
साथ छोड़ दिया
गुजरता हुआ पल
कांटों सा चुभने लगा

जब उम्मीद की किरण
नामुमकिन सी लगने लगी
तब सेहमी हुई सांसों ने
जिंदगी का अर्थ बतला दिया

इस अंधेरे ‌का कोई अंत नहीं
ये एहसास जब मन को छू ‌गया
तब बिते हुए कल के
कुछ लोग याद आने लगे

अपनो को‌ जिस कारण दूर किया
वह कारण अब धुंधला सा गया
भीड़ समझकर जिन्हें छोड़ आया
वह दोस्त अचानक आज याद आया

जीन रिश्तों को
वक़्त कि रेत में खो दिया
दिल की‌ घेहराही में
उनकी आहट‌ मेहसूस हुई

कामयाबी के नशे में
जिन तारों को मैं ने तोड दिया
आज उन्हीं कि‌ रोशनी के बगैर
ये अंधेरा छा गया

समय के इस काले आईने ने
मैं ने क्या खोया
इसका प्रतीबिंब दिखा दिया

जब अंधेरा छाया
सन्नाटों कि गूंज से
मन का‌ अकेलापन
मूखोटा चिरकर सामने आ गया



-SR.

PS: May The Force Be With You !!!

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